
इन खेलों का आयोजन सबसे पहले नवंबर 2007 में टला,...दूसरी बार पर्याप्त तैयारी नहीं होने की वजह से इसे मार्च 2008में टाला गया...लेकिन इस बार भी तैयारियों के लिहाज से तय तारीख़ पर आयोजन संभव नहीं हुआ.तीसरी बार आयोजन की दिसंबर में तय तारीख़ भी टालनी पड़ी. भारतीय ओलंपिक एसोसिएशन के अधिकारियों ने तय वक़्त पर खेलों का आयोजन नहीं होने पर जुर्माने की चेतावनी दी थी. लेकिन इसका कुछ असर नहीं हुआ. यही वजह है कि 15 से 26 फरवरी के बीच खेलों के आयोजन की तय तारीख़ को एक बार फिर टाल दिया गया है...अब इस बात की संभावना है कि खेल जून में होंगे...लेकिन पक्के तौर पर कुछ भी कहना मुश्किल है.
इस बीच ज़रा उन खिलाड़ियों के बारे में सोचिए जिन्होंने एक-एक दिन के हिसाब से अपनी तैयारियों में लगे हैं. उनके उत्साह पर कितना असर हो रहा होगा...या..यूं कहें इन खेलों में भागीदारी को लेकर उनमें उत्साह बाक़ी ही नहीं होगा. 33वें राष्ट्रीय खेल आतंकवाद के साए में हुए थे...इसकी तारीख़ भी टालनी पड़ी थी...आख़िरकार गुवाहाटी में ये सम्पन्न हो गए. लेकिन गुवाहाटी और रांची के बीच बड़ा फर्क है. उल्फा की धमकियों के बीच गुवाहाटी में राष्ट्रीय खेलों का सफल आयोजन हुआ था...इसे सरकार की मज़बूत इच्छाशक्ति का परिचायक माना गया...लेकिन रांची में बात ठीक उलट है.
इसे सिवाय लापरवाही के कुछ और नहीं माना जा सकता. रही बात ज़िम्मेदारी की तो वो सब के कंधे जाती है. भारतीय ओलंपिक एसोसिएशन जिस तरह ग़लती पर ग़लती किए जाने के बाद भी झारखंड को माफ करता रहा...उसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता. इस वजह से देश की प्रतिष्ठा को भी कम ठेस नहीं पहुंची है. अगर राष्ट्रीय खेलों का आयोजन कुछ लापरवाह नेताओं और अधिकारियों के भरोसे छोड़ दी जाए...तो इससे बुरी बात और क्या होगी?. दुर्भाग्य से यही हो रहा है.