शुक्रवार, 28 अगस्त 2009

आरएसएस ने बीजेपी को रामभरोसे छोड़ा!



बीजेपी में मचे बवंडर को लेकर सबकी निगाहें आरएसएस पर टिकी हैं. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत की बहुप्रतीक्षित प्रेसवार्ता पर सबकी नज़र है. लेकिन अगर संघ के अब तक के सफ़र को देखें तो कहीं से नहीं लगता कि मोहन भागवत कुछ भी ऐसा कहेंगे जिससे बीजेपी और संघ के रिश्तों को लेकर कोई नई चर्चा शुरू होगी. संघ की तरफ से साफ तौर पर यही कहा जाएगा कि बीजेपी एक राजनीतिक संगठन है और संघ इसके आंतरिक मामलों में कोई दख़ल नहीं देगा. अगर सवाल बीजेपी को संभालने को लेकर उठेगा...तो कहा जाएगा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमति के स्वर उठते रहते हैं और इसमें कुछ भी नया नहीं है और पार्टी नेतृत्व इस संकट से उबरने में पूरी तरह सक्षम है. ये संघ का पुराना ढर्रा है. सभी जानते हैं कि बीजेपी,..संघ के विचारों को राजनीति के क्षेत्र में आम लोगों तक पहुंचाने का काम करती है...और इसका पूरा संगठन संघ के फॉर्मूले पर काम करता है. सालों से इस बात को लेकर मीडिया में ख़बरे छपती रही हैं..कि बीजेपी संघ के इशारों पर काम करती है. इसमें बहुत हद तक सच्चाई भी है....इसके उलट सच्चाई संघ की उन बातों में भी है....जिसके मुताबिक़ बीजेपी पूरी तरह से एक स्वतंत्र राजनीतिक दल है...लेकिन मौजूदा दौर में ये बातें अब पुरानी सी नज़र आ रही हैं. उस दौर में ये बात सही लगती थी,..जब वाजपेयी और आडवाणी जैसे नेताओं के कुशल नेतृत्व में पार्टी नेता अनुशासन के दायरे में रहा करते थे...विरोध के स्वर उठते थे..लेकिन वो संयमित हुआ करते थे. लेकिन बदले हुए वक्त में जब सत्ता का कई साल स्वाद चखने के बाद पार्टी नेताओं के चरित्र में आमूल-चूल परिवर्तन हो चुका है...ऐसे में संघ का सहारा बेहद ज़रूरी लग रहा है. बीजेपी की विचारधारा बुनियादी स्तर पर भले ही पुरानी हो..लेकिन पार्टी नेताओं के आचार-व्यवहार में ज़मीन-आसमान का फर्क आ गया है. ऐसे में संघ को भी लगता है कि संक्रमण के इस काल में कुछ न कुछ करना ज़रूरी है...लेकिन डर इस बात का भी है...कि खुलकर इस बात को क़बूलने के बाद उसकी बातों पर कोई विश्वास नहीं करेगा...और सभी इस बात को समझ जाएंगे कि संघ और बीजेपी में बस नाम भर का ही अंतर है. ज़ाहिर है ऐसे में अंदरुनी तौर पर चाहे जो हो...बाहरी तौर पर सरसंघचालक बीजेपी को लेकर सार्वजनिक तौर पर कुछ नहीं कहेंगे. ये लगभग तय है.

रविवार, 10 मई 2009

राजनीति में दोस्त कौन ?



25 सालों तक साथ-साथ चले मुलायम सिंह यादव और आज़म ख़ान के रास्ते अब अलग होते नज़र आ रहे हैं. मुलायम समाजवादी पार्टी के मुखिया हैं और आज़म इसके आला नेताओं में एक. इन आला नेताओं में अमर सिंह भी शामिल हैं. अमर और आज़म दोनों पार्टी के महासचिव हैं....लेकिन दोनों की हैसियत में ज़मीन आसमान का अंतर है. इतने दिन तक आज़म अपने गुस्से का इजहार करते रहे लेकिन मुलायम चुप रहे लेकिन ज्योंही अमर ने कोई बड़ा फ़ैसला करने की धमकी दी. तो मुलायम ने आज़म पर बरसने में तनिक भी देर नहीं की.

ये राजनीति की ऐसी धारा है जिसके ख़िलाफ जाने की हिम्मत गिने चुने नेताओं में भी नज़र नहीं आती. अमर सिंह को मुलायम इतने दिनों तक साथ ढोते रहे तो आज़म को कोई आपत्ति नहीं थी कि लेकिन जब अमर आज़म के घर में ही उनके पर कतरते नज़र आए...तो टकराव लाजिमी था. दरअसल आज़म अब तक जयाप्रदा के बहाने अमर को लेकर ही अपनी नाराज़गी को ज़ाहिर करते रहे. ये बात सभी समझ रहे थे...लेकिन बोलता कोई नहीं था. अब सबकुछ सामने आ चुका है. कहने-सुनने की भी सूरत नहीं बची है.

अमर पाक साफ नहीं तो आज़म भी दूध के धुले नहीं हैं...लेकिन जब मुलायम से जी भर खरी-खोटी सुनने के बाद आज़म ख़ान ने अपनी बात रखने की कोशिश की गला भर आया. वे 25 साल की दोस्ती की बात दुहराते नज़र आए. उन्होंने लाख नाराज़गी के बाद भी सार्वजनिक रुप से मुलायम को बुरा नहीं कहा. यही वो वजह थी कि आज़म का मन भारी था.

मुलायम की बस चलती तो अमर सिंह के दबाव में उन्होंने आज़म ख़ान को कब का बाहर का रास्ता दिखा दिया होता. ऐसा इसलिए नहीं हुआ क्योंकि आज़म एक बड़े मुस्लिम नेता भी हैं. यानी दोस्ती...विचारधारा...इन सब बातों की मजबूरी नहीं थी...लाचारी थी तो वोटबैंक की.

दरअसल ये राजनीति का चेहरा बन चुका है. कहीं अमर हैं तो कहीं कोई और है. ऐसे लोग तो हर जगह हैं. अमर सिंह जैसा दोस्त मिलने पर बाक़ी दूसरों की क्या ज़रूरत. आज़म शायद इस बात का ख़्याल नहीं रख पाए...इसलिए अपना गुस्सा खुलकर ज़ाहिर करते रहे. वरना चुप रहने के सिवा दूसरा रास्ता पहले ही कहां था.

..तो क्या जनादेश बेमतलब है?


चुनावी नतीजे अभी नहीं आए हैं लेकिन सरकार बनाने की जोड़-तोड़ शुरू है. जनता किस दल के पक्ष में और किसके विरोध में अपने नतीजे सुनाएगी…ये भविष्य के गर्भ में है लेकिन नेताओं को क़रार नहीं. बड़बोलेपन पर लगाम लग चुकी है. सबकी आवाज़ मुलायम हो गई है ताकि आगे ज़्यादा बेशर्मी न दिखानी पड़े.

लड़ाई के मैदान में जंग जीतने या हारने की बात होती है लेकिन यहां तो मैदान में ही सुलह की बात हो रही है. सत्ता सबसे ऊंची चीज़ हो गई है...विचारधारा का बखान करने वाले दलों की प्रतिबद्धता बस एक शब्द के आस-पास सिमट कर रह जाती है...कहीं वो धर्मनिरपेक्षता है तो कहीं तुष्टिकरण. ये जो कुछ भी हो लेकिन सही मायने में लोकतांत्रिक चलन नहीं माना जा सकता.

किसी में इतनी हिम्मत नहीं कि वो जिन विचारों में विश्वास रखता है...उसके आधार पर हासिल की गई सफलता से ही संतुष्ट हो. यहां झुकने की बात तो छोड़िए लोग कुछ भी करने को तैयार दिखते हैं. कहीं कोई दूसरे पर दबाव बनाने के लिए तीसरे का नाम ले रहा है...तो कोई नए शब्दों को गढ़ने में लगा है.

लोकतंत्र में विश्वास रखने वाला कोई भी व्यक्ति यही कहेगा कि ये जनादेश का सम्मान नहीं है. अगर हम मतदाताओं की इच्छा का सम्मान करते हैं तो फिर उसके फैसले को भी सर माथे पर रखना चाहिए. जीतने के बाद सरकार बनाने की बात या इसके लिए कोशिश का मतलब तो समझा जा सकता है...लेकिन इससे पहले ही सरकार में अपना बर्थ सुनिश्चित करने की गारंटी को क्या कहेंगे. लेकिन हम सब यही होता हुआ देख रहे हैं.

कहा जा सकता है कि राजनीति में जनता की राय की कोई अहमियत नहीं रह गई है. नेता चाहें तो उसकी ना,...को हां में आसानी से बदला जा सकता है. इसे तय मानिए.

शनिवार, 21 मार्च 2009

संघ की नई कमान

मोहनराव भागवत को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सरसंघचालक मनोनीत किया गया है. कुप्पाहल्ली सीतारमैया सुदर्शन के दायित्व छोड़ने की घोषणा के साथ ही भागवत दुनिया के सबसे बड़े सामाजिक संगठन के मुखिया बन गए हैं. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बाक़ी संगठनों से एक मायने में बिल्कुल अलग है...और वो है अपनी विचारधारा के प्रति समर्पण.

सन् 1925 में विजयादशमी के दिन नागपुर में इसकी स्थापना हुई थी...तब से अब तक 80 साल से ज़्यादा ग़ुज़र चुके हैं...लेकिन समय के साथ उसकी विचारधारा नहीं बदली. यहां तक की गिनती के परिवर्तनों को छोड़ दें तो संघ का गणवेश भी तकरीबन वही रहा...जो 1925 में था। कई लोगों को ये देखकर आश्चर्य होता है। नई पीढ़ी के युवाओं की बड़ी संख्या संघ से ख़ुद को जोड़ने में इसे एक बाधा की तरह देखती है....बावजूद इसके संघ ने इसमें कोई तब्दीली नहीं की।

भागवत की छवि की बात करें तो वह उदारवादी रही है. उन्होंने देश के अलग-अलग हिस्सों में संघ के प्रचारक के रूप में विभिन्न ज़िम्मेदारियों को निभाया. कोलकाता और पटना में भी वे काफी समय रहे. सरकार्यवाह बनाए जाने के बाद पटना में अपने अभिनंदन समारोह में उन्होंने विवेकानंद की पंक्तियों को उद्धृत किया था....”शक्तिशाली भारत का विचार करने पर हमारे सामने जिस देश की परिकल्पना उभरती है...उसके मुताबिक़ भारत का शरीर इस्लाम का होना चाहिए जबकि हृदय हिंदू.”
संघ के मुसलमानों के प्रति प्रचलित दृष्टिकोण से ये बात काफी अलग दिखती है. शरीर और हृदय की उपयोगिता को लेकर बहस-मुबाहिसे की पूरी गुंजाइश है लेकिन इससे एक बात साफ हो जाती है कि वैचारिक रूप से मुसलमानों को संघ अवांछित नहीं मानता।
संघ की शाखाओं की गिरती संख्या को क़ाबू में करना भागवत के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी। विभिन्न सामाजिक कार्यक्षेत्रों में संघ परिवार के संगठनों ने अच्छी-ख़ासी प्रगति की है...लेकिन जिस शाखा के माध्यम से संघ अपने परिचय का दायरा हर दिन बढ़ाता रहा है...उसकी संख्या तेज़ी से घटी है। इसको लेकर आरएसएस के भीतर हलचल है. शाखा संघ के विस्तार का आधार रही हैं...और इसकी अनदेखी किसी तरह से नहीं की जा सकती।
संघ किसी अकेले व्यक्ति के इशारे पर नहीं चलता है इसलिए इसकी संभावना न के बराबर है कि भागवत के आने से संघ के वैचारिक स्वरूप या उसके तेवर पर कोई फर्क पड़ेगा…लेकिन कोई भी संगठन अपने नेतृत्व से अप्रभावित नहीं रहता. इस लिहाज से भागवत सबकी नज़रों में रहेंगे.

शुक्रवार, 20 मार्च 2009

साध्वी का समर्पण !

राष्ट्रीय राजनीति में समान विचारधारा का हवाला देकर उमा भारती ने आडवाणी के समर्थन का ऐलान किया है. ये कुछ उसी तरह है कि दुश्मन से मुक़ाबले में हारने की सूरत में अहिंसा का दामन पकड़ लिया जाय. वरना क्या मुश्किल थी कि वो इस बार भी अपनी ताक़त पर मैदान में उतरतीं. लगता है पार्टी की एक और क़रारी हार की आशंकाओं की वजह से उन्हें कोई दूसरा रास्ता नहीं सूझ रहा.

भाजपा से अलग होने के बाद उमा ने अब तक चैन की सांस नहीं ली है. तमाम मेहनत के बाद भी वो न तो अपनी भारतीय जनशक्ति पार्टी को मध्यप्रदेश में एक विकल्प के रूप में खड़ा कर पाईं और न ही राष्ट्रीय राजनीति में कोई स्थान सुरक्षित करने में क़ामयाब रहीं. भाजपा से उमा को जो पहचान मिली थी वो भी अब धुंधली पड़ती जा रही है. नई पार्टी बनाना तो उमा को आसान लगा था लेकिन अब इसे चलाना मुश्किल हो रहा है.

हिंदुत्व की लीक पर चलकर राजनीतिक क़ामयाबी हासिल करने की डगर उन्हें कठिन लग रही है. दूसरे रास्ते पर वो जाना नहीं चाहतीं...क्योंकि इसके बाद रही सही लोकप्रियता भी ख़त्म होने का ख़तरा है. ऐसे में साध्वी के सामने गिने-चुने विकल्प बचे थे और उन्होंने प्रधानमंत्री पद के लिए आडवाणी के समर्थन की घोषणा कर डाली. अब उनके इस ऐलान के अंदरखाने का सच क्या है...उसके लिए कुछ और इंतज़ार करना होगा. लेकिन इतना तो साफ है कि साध्वी अब समर्पण की राह पर हैं.

सोमवार, 9 मार्च 2009

जुग जिए से खेले फिर होली...होली है...

होली आ चुकी है...पर हुड़दंग नदारद है. दिल्ली में बिन हुड़दंग के होली देख तो सकता हूं,...पर महसूस करना मुश्किल है. अपने कमरे और फ्लैट तक सिमटी दुनिया में एक दिन की छुट्टी की ख़ुशी..होली की मस्ती पर भारी पड़ती है. इससे ज़्यादा चाह किसी की नहीं. वरना होली क्या...दीवाली क्या. जेब में बस पैसे रहने चाहिए. लेकिन गांवों में होली खेलने से बड़ी ख़ुशी दूसरी नहीं होती...इसे साल का सबसे बड़ा सौभाग्य माना जाता है. हर ज़ुबान से सुनेंगे...जुग जिए से खेले फिर होली...होली है. मतलब ये कि ज़िंदगी सलामत रही तभी होली दोबारा खेलेंगे...इसलिए जी-भर की मस्ती आज ही होनी चाहिए।

दोपहरी में हाइवे किनारे गिरे पलाश के फूलों को देखकर एकबारगी याद आई इसकी अहमियत. स्कूलों में सुना था पलाश के फूलों से रंग बनाए जाते हैं. पर यहां पलाश को कोई पूछने वाला नहीं. इसके फूल टायरों तले कुचलते चले जाते हैं...कोलतार की सड़क पर इन फूलों के बीच पड़ा बीज अपना अस्तित्व खो देता है..नए पलाश की कोई आस नहीं बचती।

ठीक इसी तरह ज़िंदगी की रफ्तार में हमें याद नही रहता कि अपनी विरासत को हम किस तरह भूलते जा रहे हैं...जिस मस्ती पर लगाम हमारे लिए बर्दाश्त से बाहर थी...घर के बड़े के ख़िलाफ बालमन विद्रोह कर बैठता था...आज बड़े होने पर उसे भूल जाना ही हम बेहतर समझते हैं. यही वजह है कि हमारी नई पीढ़ी को उसकी पहचान पता नहीं।

दिल्ली में आज अगर पुरबिया होली नहीं दिख रही...तो दोष किसका है? दरअसल हमने ही तो अपने बच्चों को जड़ों से दूर रखा...हाल ये हुआ कि भरे-पूरे घर में तमाम लोग ख़ुश होते हैं...लेकिन फ्लैट की खिड़की से बाहर झांककर हमारी सूनी आंखें अपने लिए ख़ुशी ढूंढ़ती रहती हैं...होली फिर आ गई है...पर होली खेलने का मतलब हमसे दूर हो गया है।

लेकिन....गांवों में ऐसा नहीं है...पछिया बयार चाहे जितनी बह रही हो...लेकिन संस्कार,..सलूक और ठेठ देसी अंदाज़ को मुरझाना इसके बस की बात नहीं. बाहर में यही अखरता है. कुछ भी पा लें आप...गांव तो गांव ही है...वो दूर ही रहेगा. चलिए एक दिन के लिए ही सही...उसकी याद की जाय...और मौक़ा तलाशा जाय अबकि छुट्टी में जड़ों की तलाश का.

शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2009

रास्ते और भी हैं



मंदी ने निजी क्षेत्र को सबसे ज़्यादा चोट पहुंचाई है. इसकी मार की वजह से नौकरियों पर तलवार लटकनी स्वाभाविक है,...लेकिन मंदी के बहाने अधिकांश जगहों पर प्रबंधन अपनी गोटी लाल कर रहा है. श्रमशक्ति के इस्तेमाल के लिहाज से हर कंपनी की व्यवस्था सटीक नहीं होती..ऐसे में मौजूदा दौर उनके लिए कई मुश्किलों के साथ बेहतरीन अवसर भी लेकर आया है...हमारा इशारा छंटनी की तरफ है. कई बड़ी कंपनियों ने जिस तरह अपने सालों पुराने कुशल कामगारों को बाइज्जत विदा किया ,..उससे ये बात साबित होती है.

आप लायक हैं,...हमारे विकास में आपके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता. लेकिन हम लाचार हैं...मजबूर हैं....कोई और रास्ता नहीं..और आख़िरी शब्द-युग्म....”आपको जाना ही होगा.”

नौकरी ख़त्म होना अंतिम बात नहीं होती...इससे आगे उम्मीदें,..आशाएं,...सपने...ऐसी कई बातें हैं जिन पर आघात होता है. ये सवाल अब सोचने को विवश कर रहा है कि क्या मुश्किल के इस वक़्त में नौकरियों को ख़त्म करना ही अकेला रास्ता बचा है. सच तो ये है कि अगर वाक़ई किसी कंपनी पर मंदी का सीधा असर है...तो वो अपने कर्मचारियों को नुक़सान के लिहाज से वेतन में कटौती के लिए विश्वास में ले सकती है.

अगर सच्चाई के साथ प्रबंधन पूरी तस्वीर कर्मचारियों के सामने रखे...तो अपने दोस्तों को नौकरी से हटाने की जगह ज़्यादातर लोग मुश्किल वक्त साथ-साथ बिताना पसंद करेंगे. वे इस बात से शायद ही पीछे हटेंगे कि उनके वेतन में ज़रूरी कांट-छांट हो जाय लेकिन किसी की नौकरी न जाय. कई कंपनियों में ऐसा हुआ भी है...लोग हालात को समझते हैं और ज़िद की कोई वजह नहीं है. लेकिन बिना ठोस वजह के मंदी का बहाना बनाना सही नहीं है.

इसमें शर्म की क्या बात है?

स्लमडॉग मिलेनियर को लेकर कई बातें हो रही हैं. ज्यादातर लोग यही कह रहे हैं कि ये भारत की गरीबी को दिखाने वाली फिल्म है. उनके मुताबिक हिन्दुस्तान के अंधेरे कोने पर ही फिल्मकार का कैमरा केंद्रित रहा है. ये कहना कुछ अजीब सा लगता है कि स्लमडॉग मिलेनियर इस वजह से सफल हुई कि उसमें भारत की गरीबी दिखती है.

इस फिल्म की पटकथा बेहद कसी हुई थी,...एक के बाद एक संयोग का ख़ूबसूरत फिल्मांकन,...और इससे आगे आपस में उलझने की बजाय सुलझते जाते कथा-तंतु। स्लमडॉग के आगे बढ़ने की कहानी में भारत के सभी शेड हैं. मुश्किल बस इतनी है कि भारत को किसी विदेशी फिल्मकार ने बड़े ही क़रीब से समझने की कोशिश की है...ये प्रयास क़ामयाब रहा है. यही वो वजह है कि हमारे कई दोस्तों को ये बातें चुभ रही हैं. मुगालते में जीने की बात तो हम में है...वरना फिल्म में बुरा क्या है. कोई ये तो बताए कि डैनी बॉयल ने हक़ीक़त से उलट क्या बातें फिल्म में दिखलाई हैं. पूरी सच्चाई सैल्युलाइड पर नहीं उतर सकती. लेकिन जितनी उतर सकती है उनमें से कई स्लमडॉग में हू-ब-हू नज़र आई है. भुलावे और छलावे में वक्त गुज़ारने की आदत हमारी है.

बॉलीवुड में कितनी फ़िल्में बन रही हैं जिसमें ग्रामीण भारत,...झुग्गी झोपड़ियों में रहने वाला भारत,..अपने हाल पर जीने को मजबूर,...जीने के लिए हर समझौता करने को तैयार लाचार भारत की कहानी दिखती है....गिनती की फिल्मों को छोड़कर कहां देख पाए हैं हम..अपना देश...अपनी धरती....धरती-पुत्रों की कहानी...युवाओं का संघर्ष, बेरोज़गारी की व्यथा, भ्रूण हत्या...शेयर बाज़ार की लूट. सपना तो ये सब है,...हमें डर लगता है कि कहीं कोई हमारा चेहरा न देख ले...ये डर क्यों है?,…हम छुपाना चाहते हैं दुनिया से अपनी हक़ीक़त. नहीं जताना चाहते कि हम क्या हैं. दरअसल हम चमक रहे हैं इसलिए अपना देश भी हमें चमकता हुआ नज़र आता है.

हम झुग्गियों में रहने वाले लोगों को अपने देश का बाशिंदा नहीं मानते तभी तो इसे गरीबी दिखाने का कुत्सित प्रयास कह रहे हैं,...वरना क्या ग़लत है कि किसी ने बिना चकाचौंध का बड़ा सा सेट लगाए....एक सपनीली फिल्म,...मटमैली बस्ती में फिल्मा ली. इस फिल्म की सफलता में चुभने वाली बात क्या है. संगीत हमारा था,..विशुद्ध हमारा...पूरी दुनिया ने इसे पसंद किया...डिंग-डिंग-डिंगा पर हम ही नहीं झूमे,..सभी के पांव थिरके. जय हो...का मतलब भले कोई देर से समझे पर भाव समझने में किसी को दुविधा नहीं हुई.

बंधु...ये भारत का आकर्षण है,...भारत की जीवनीशक्ति को सलाम है...झेंपिए मत. भारत क्या है...कैसा है...अब इसे नए सिरे से समझाने की ज़रूरत नहीं है...ज़रूरत है तो हमें ख़ुद को जानने की,...जिसके लिए आज भी हमें विदेशी चश्मा लगाना पड़ता है...ये क्या बात हुई...कि जिस बात को लेकर दुनिया ताली बजा रही है...उसी पर हमें शर्म आ रही है.

शनिवार, 17 जनवरी 2009

मैं तो टल्ली हो गया!

34वें राष्ट्रीय खेलों के आयोजन को चौथी बार टाल दिया गया है. झारखंड को जब राष्ट्रीय खेलों की मेज़बानी मिली थी तो राज्य सरकार ने इसे अपनी उपलब्धि बताया था...लेकिन इस उपलब्धि का ‘बोझ‘ ढोने में वो नाकाम रही. राज्य में राष्ट्रीय खेलों के आयोजन के लिहाज से आधारभूत संरचना का अभाव था. इसको लेकर लंबी-चौड़ी योजनाएं बनीं. स्टेडियम से लेकर खेलगांव के निर्माण के लिए देश भर से टेंडर मंगवाए गए. लेकिन कागज़ की बजाय ज़मीन पर काम तेज़ी से नहीं हुआ. राज्य की राजनीतिक अस्थिरता भी इसके पीछे एक प्रमुख वजह रही.



इन खेलों का आयोजन सबसे पहले नवंबर 2007 में टला,...दूसरी बार पर्याप्त तैयारी नहीं होने की वजह से इसे मार्च 2008में टाला गया...लेकिन इस बार भी तैयारियों के लिहाज से तय तारीख़ पर आयोजन संभव नहीं हुआ.तीसरी बार आयोजन की दिसंबर में तय तारीख़ भी टालनी पड़ी. भारतीय ओलंपिक एसोसिएशन के अधिकारियों ने तय वक़्त पर खेलों का आयोजन नहीं होने पर जुर्माने की चेतावनी दी थी. लेकिन इसका कुछ असर नहीं हुआ. यही वजह है कि 15 से 26 फरवरी के बीच खेलों के आयोजन की तय तारीख़ को एक बार फिर टाल दिया गया है...अब इस बात की संभावना है कि खेल जून में होंगे...लेकिन पक्के तौर पर कुछ भी कहना मुश्किल है.

इस बीच ज़रा उन खिलाड़ियों के बारे में सोचिए जिन्होंने एक-एक दिन के हिसाब से अपनी तैयारियों में लगे हैं. उनके उत्साह पर कितना असर हो रहा होगा...या..यूं कहें इन खेलों में भागीदारी को लेकर उनमें उत्साह बाक़ी ही नहीं होगा. 33वें राष्ट्रीय खेल आतंकवाद के साए में हुए थे...इसकी तारीख़ भी टालनी पड़ी थी...आख़िरकार गुवाहाटी में ये सम्पन्न हो गए. लेकिन गुवाहाटी और रांची के बीच बड़ा फर्क है. उल्फा की धमकियों के बीच गुवाहाटी में राष्ट्रीय खेलों का सफल आयोजन हुआ था...इसे सरकार की मज़बूत इच्छाशक्ति का परिचायक माना गया...लेकिन रांची में बात ठीक उलट है.

इसे सिवाय लापरवाही के कुछ और नहीं माना जा सकता. रही बात ज़िम्मेदारी की तो वो सब के कंधे जाती है. भारतीय ओलंपिक एसोसिएशन जिस तरह ग़लती पर ग़लती किए जाने के बाद भी झारखंड को माफ करता रहा...उसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता. इस वजह से देश की प्रतिष्ठा को भी कम ठेस नहीं पहुंची है. अगर राष्ट्रीय खेलों का आयोजन कुछ लापरवाह नेताओं और अधिकारियों के भरोसे छोड़ दी जाए...तो इससे बुरी बात और क्या होगी?. दुर्भाग्य से यही हो रहा है.

शुक्रवार, 16 जनवरी 2009

द्रोणाचार्य का ये हाल!



ओलंपिक के दौरान हर सुबह अख़बारों में छपी पदक-तालिका को लोग बड़ी उत्सुकता से देखते हैं. लेकिन हर बार निराशा ही हाथ लगती है. तब और भी कोफ्त होती है जब युगांडा और इथोपिया जैसे देश हमसे काफी आगे नज़र आते हैं. इसके पीछे की वजह को दुहराने की ज़रूरत नहीं. लेकिन ताज़ा कहानी सुनकर आप चौंक जाएंगे....अख़बारों में ये पढ़कर हैरत हुई कि तीरंदाज़ी के राष्ट्रीय कोच लिम्बा राम के पास सर ढंकने तक की जगह नहीं है. जयपुर में रहने वाले लिम्बा का ठिकाना फिलहाल एक विधायक के सरकारी निवास का गैरेज है.

उदयपुर ज़िले के एक गांव में जन्मे लिंबा अहरी जनजाति से ताल्लुक रखते हैं...जंगली इलाक़ों से शुरूआत कर तीरंदाज़ी के ज़रिए उन्होंने ओलंपिक का सफर तय किया. तीरंदाज़ी में देश का नाम रोशन करने पर उन्हें १९९१ में अर्जुन पुरस्कार से नवाजा गया. लेकिन कहानी ये नहीं है,...दरअसल लिम्बा राम ने अब तक शादी नहीं की है,....इसके पीछे की वजह बिल्कुल अलग है. उन्हें नहीं लगता था कि आर्थिक रूप से वे परिवार का बोझ उठाने में सक्षम हैं. आज भी उन्हें यही लगता है...

तब जबकि वे तीरंदाज़ी के राष्ट्रीय कोच हैं. उनकी तनख्वाह बस इतनी है कि किसी तरह अपना ग़ुज़ारा हो जाय. १९९२ के बार्सिलोना ओलंपिक में वे कांस्य पदक से मामूली अंतर से चूक गए थे. उनके नाम विश्व रिकॉर्ड भी रहा है. ओलंपिक में तीन बार देश का प्रतिनिधित्व करने वाले इस द्रोणाचार्य का हाल सुनकर आपकी आंखें गीली हुए बिना नहीं रहेंगी. खेल के मैदान में हासिल उनकी उपलब्धियों से देश का सम्मान तो बढ़ा लेकिन लिम्बा राम की हैसियत नहीं बदली...उन्हें कभी घास काटने की नौकरी दी गई तो कभी चपरासी का काम करने को कहा गया.

बावजूद इसके उन्हें किसी से कोई शिकायत नहीं है. लिम्बा राम कहते हैं कि भारतीय होने को लेकर वे गर्व महसूस करते हैं और एक आम नागरिक के रूप में ज़िंदगी ग़ुज़ारने में उन्हें कोई तकलीफ नहीं. लेकिन बड़ा सवाल ये है कि क्या क्रिकेट के बारे में भी ऐसी कल्पना की जा सकती है,...

क्या आप सोच भी सकते हैं कि राष्ट्रीय टीम के कोच की ये हालत होगी....अगर होगी..तो क्या होगा? क्या बस इतने भर से इस ख़बर को भूल जाना चाहिए कि लिम्बा अपनी हालत से संतुष्ट हैं....उन्हें किसी से गिला-शिकवा नहीं.

एक रोचक तथ्य ये है कि राष्ट्रीय तीरंदाज़ी संगठन के अध्यक्ष लोकसभा में विपक्ष के धाकड़ नेता विजय कुमार मल्होत्रा हैं....उनका कहना है कि लिम्बा ने कभी इस बारे में शिकायत नहीं की. यानी नेताओं के लिए खेल,....बस राजनीति चमकाने का एक ज़रिया भर हैं....अगर ये बात सच नहीं होती तो क्या लिम्बा के मुंह खोलने का इंतज़ार किया जाता? लिम्बा ने अब भी मुंह नहीं खोला है,...उन्होंने बस पत्रकारों के सवालों का जवाब दिया है.

९ जनवरी को उन्हें राष्ट्रीय कोच नियुक्त किया गया है...उनसे पहले ये ज़िम्मेदारी दक्षिण कोरिया से आयातित कोच के कंधों पर थी...लेकिन सरकार को उम्मीद है कि अगले साल दिल्ली में होनेवाले राष्ट्रमंडल खेलों के लिए वो खिलाड़ियों को इस तरह प्रशिक्षित करेंगे कि पदकों की झड़ी लग जाए.

लिम्बा कुछ नहीं बोल रहे...उनसे जो कुछ हो सकता है वो करने में लगे हैं. जैसा कि अब तक वे करते आए हैं...लेकि क्या आप और हम हक़ीक़त को जानने के बाद अगले साल पदक-तालिका में भारत का नाम ढूंढ़ने को इतने उत्सुक होंगे?

शनिवार, 27 दिसंबर 2008

देशभक्ति का ज्वार-भाटा...


युद्ध का उन्माद आजकल हरतरफ नज़र आ रहा है. पाकिस्तान ने अपनी पलटन सीमाओं की तरफ भेजनी शुरू की..तो भारत में हलचल मच गई. मीडिया ने इस ख़बर को सर आंखों पर उठा लिया. कहीं दोनों देशों की सैनिक ताक़त की तुलना की जाने लगी...तो कहीं ये बताया जाने लगा कि युद्ध होने पर पाकिस्तान कितने दिन में मिट जाएगा? लोगों को ऐसी ख़बरें भाती हैं...लेकिन बस इतनी सी नहीं...उन्हें सतही जानकारियों के अलावा कुछ और देखने और सुनने को चाहिए..जो फिलहाल नहीं मिल रहा. ख़बरों से गहराई नदारद है. ऐसी पत्र-पत्रिकाओं की भी कमी पड़ गई है जिसमें तथ्यात्मक विवरण प्रकाशित होते हों.

ऐसे में युद्ध की आशंकाओँ की मार्केटिंग हो रही है. एक देश के रूप में हम अपना गौरव-गान चाहे जितना करते हों...बहुत हद तक तल्ख सच्चाई ये है कि आम नागरिकों के ख़ून में देशभक्ति एक मौसमी ज्वार की तरह आता है और भाटे की तरह चला जाता है. इसकी भी कोई तयशुदा मियाद भी नहीं है. ये ज्वार दरअसल आता नहीं है बल्कि लाया जाता है...और ये काम करता है मीडिया. इन दिनों यही हो रहा है.

सेना में हर पद पर लोगों की भारी कमी है. जवान से लेकर अधिकारी तक की किल्लत है. लेकिन इसकी याद तब आएगी जब युद्ध के दौरान हमें खामियाजा भुगतना पड़ेगा. तब लोग ख़ूब चिल्लाएंगे...ऊंची आवाज़ में ये बताने की प्रतिस्पर्द्धा होगी कि हमारे अंदर कहां कमी थी.

आप सभी को याद होगा कि कारगिल युद्ध के दौरान हमारे पास शहीद जवानों के शवों को उनके घर पहुंचाने के लिए बक्से ही नहीं थे. तब आनन-फानन में मुंहमांगी क़ीमत पर रातों-रात इसे इज़रायल से मंगवाया गया. इसको लेकर भी तत्कालीन रक्षामंत्री पर घोटाले के आरोप लगे. सच क्या था भगवान जाने...पर चूक तो साफ नज़र आ गई कि हम आपात स्थितियों के लिए कितना सावधान रहते हैं.

अभी वक़्त है कि हम अपनी कमियों को दुरुस्त कर लें...ये ज़िम्मेदारी अकेले रक्षा मंत्रालय, अधिकारी और नेताओं की नहीं है बल्कि मीडिया की भी उतनी ही है.

गुरुवार, 11 दिसंबर 2008

नासमझ कौन है?


लगातार पांचवें हफ्ते महंगाई की दर गिरावट पर है. इस ख़बर ने मनमोहन सिंह को बड़ी राहत दी होगी. विधानसभा चुनाव के नतीजों की वजह से नींद ऐसे भी अच्छी आ रही थी,...अब और सुकून मिला होगा. .पीएम को पहले डर रहा होगा कि कहीं आम लोग बेलगाम क़ीमतों से प्रभावित होकर कांग्रेस नीत सरकार के ख़िलाफ वोट न डाल दें....लेकिन ये आशंका अब ख़त्म हो गई होगी. अब पीएम मान के चल रहे होंगे कि आम लोगों को उनकी गंभीर कोशिशें भा गईं. लोगों ने ये समझ लिया कि सरकार को जो करना था वो कर रही है...और बहुत कर रही है. उन्हें तो यही लग रहा होगा कि जनता के सोचने का स्तर ऊंचा उठ गया है...वो उनकी बेबसी समझ रही होगी...उसे भी पता है कि ओपेक देश तेल की क़ीमतों को कम करने की गुहार नहीं सुनते...वो अपने लिहाज से काम करते हैं.

हम कोई हवाई क़िले बांधने की कोशिश नहीं कर रहे. बल्कि पीएम और उनके सहयोगियों की कार्यशैली के आधार पर उनकी वर्तमान मन:स्थिति का अंदाज़ा लगा रहे हैं. आप पूछेंगे कि एक व्यक्ति विशेष के मन के बारे में सपाट ढंग से ऐसा कैसे कहा जा सकता है. आपका कहना बिल्कुल ठीक है...इसलिए हमने कहा...ऐसी कोशिश कर रहे हैं.

चलिए मुद्दे पर आते हैं. भारत में शहर हों या गांव,...अगर एक औसत मतदाता की बात करें तो ज़्यादातर को ये पता भी नहीं होगा कि ये महंगाई दर कम कैसे हो रही है. कोई जानने की कोशिश भी नहीं करता...करता है तो भी समझ नहीं पता. अरे भई! जब सारी चीज़ें महंगी हैं तो फिर ये महंगाई की दर नीचे कैसे जा रही है... और अगर दुनिया भर के उतार-चढ़ाव के कारण ऐसा हो रहा है तो हम इसे महंगाई का अपना मीटर क्यों मानें. और ये जो मीटर है...वो भी हफ्ते दो हफ्ते पीछे का होता है....ठीक-ठीक याद रखना भी मुश्किल. मान लीजिए हफ्ते-पखवाड़े भर पहले महंगाई जितनी थी...उसका परिणाम ये महंगाई का मीटर मौजूदा वक़्त में बताता है...तो फिर इसका हिसाब रखने का मतलब क्या है.

अब अगर क्रूड ऑयल के सस्ता होने से भारत में महंगाई की दर गिर गई...तो इसमें सरकार काहे का ढोल पीट रही है. पहले तो सब कह रहे थे...हमारा दोष नहीं है...हम क्या कर सकते हैं....हमारे वश की बात नहीं है...तो फिर अब इसके पीछे सरकार की गंभीर कोशिशों को श्रेय देने की बात कहां से आ गई. ख़तरा ये भी बरक़रार है कि जुलाई के बाद चार महीनों में तिहाई क़ीमत पर आया कच्चे तेल का दाम अगर अगले चार महीनों में फिर ऊपर चढ़ गया तो क्या होगा ?

अब..जनता परिपक्व हो रही है या देश के कर्ता-धर्ता और भी नासमझ....ये बात समझना मुश्किल नहीं.

सोमवार, 8 दिसंबर 2008

पत्रकारिता के दरबार में सिद्धांतों का चीर-हरण


महाभारत की कहानी सबको याद होगी. युद्धिष्ठिर को धर्मराज कहा जाता था. इसलिए क्योंकि वो सत्यवादी थे, न्यायप्रिय थे,...उनके चारों अनुज एक से बढ़कर एक थे. कोई महाबलशाली तो कोई धनुर्धर. बावजूद इसके इन पांचों की पत्नियां भरे दरबार में नंगी की जाती रही और वे कुछ नहीं कर सके. इसलिए नहीं कि इन पांडु पुत्रों में क्षमता नहीं थी. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि 'धर्मराज' युद्धिष्ठिर ने द्रौपदी को दांव पर लगाने का फ़ैसला ख़ुद किया था....और वो ठहरे नीतिवान..इसलिए बाज़ी हारने के बाद दु:शासन का विरोध न करने को वो ज़्यादा नीतिसंगत मानते थे. बाक़ी के चारों अनुजों का ख़ून खौल रहा था...लेकिन उन्हें बड़े भाई के हर आदेश का पालन करना द्रौपदी की इज़्ज़त बचाने से ज़्यादा सही लगा. आगे क्या हुआ...सभी जानते हैं...अवतारी कृष्ण न होते तो हस्तिनापुर के दरबार के उस हाल-ए-बयां को लिखने में महर्षि वेदब्यास की उंगलियां भी कांप जातीं...और ये भारत के सभी महाकाव्यों का सबसे शर्मनाक अध्याय होता. धर्म की दृष्टि से...पौरुष की दृष्टि से और न्याय की दृष्टि से भी.

बाद में महाभारत की लड़ाई हुई..और..इसमें जीत हासिल करने के लिए 'धर्मराज' ने झूठ का भी सहारा लिया...तो क्या धर्मराज के विचार परिवर्तित हो गए थे...या उनके 'नीतिसंगत' दृष्टिकोण के मुताबिक़ विशेष अवसरों पर झूठ बोलना सही था. मुझे आज भी ये बात मथती है कि युद्धिष्ठिर ने अपमान की पराकाष्ठा के वक़्त नीति-अनीति पर किस तरह से विचार किया...और किया तो उन्हें धृतराष्ट्र पुत्रों का विरोध सही क्यों नहीं लगा.

महाभारत धारावाहिक में मैंने ये सब देखा था...तब स्कूल में पढ़ता था...चौथी या पांचवीं में था. आज लगभग सत्रह-अठारह साल बाद ये बातें याद आ रही हैं...ये मन को बुरी तरह मथ रही हैं. पत्रकारिता में चार साल से हूं पर पिछले कुछ महीनों के अनुभव जीवन भर याद रहने वाले हैं. सोचने को ये विवश करेंगे.

दिनकर की कविताओं में कहीं पढ़ा था...'हो चाहे जहां अनय..उसको रोको रे...यदि ग़लती करें..शशि-सूर्य उन्हें टोको रे'. इन शब्द-युग्मों का मतलब मुझे पत्रकारिता समझ में आया था. पत्रकारिता से रोटी कमाने का फ़ैसला मेरा अपना था. मुझे लगता था अपने स्वाभाविक गुणों का इस्तेमाल मैं इसके सिवाय कहीं और नहीं कर सकता. लेकिन काम के दौरान हासिल हो रहे अनुभवों से महसूस कर रहा हूं कि पत्रकारिता के लिए जो गुण मुझे स्वाभाविक और बेहद ज़रूरी लगते थे....दरअसल वो इस पेशे में अब अवांछित माने जाने लगे हैं. जैसे हर ग़लत बात का विरोध करना.

महाभारत की पृष्ठभूमि में कहूं तो पत्रकारिता के दरबार में सिद्धांतों का चीर-हरण हो रहा है...और धर्मराज (वरिष्ठ पत्रकार) उसी तरह सर झुकाए बैठे हैं...उनके अनुजों की राह भी पुरानी है. महाबलशाली,...धनुर्धर..कुरूपुत्रों को सबक़ सिखाने की क्षमता रखने वाले अनुजों के कथानक बदले नहीं हैं. वे हर आदेश बजाने को तैयार हैं..सब कुछ सहने को तैयार हैं. धर्मराज युद्धिष्ठिर ने ये सब नीति के पालन के नाम पर किया था और करवाया था...वर्तमान में ये प्रोफेशनलिज़्म के नाम पर किया जा रहा है. उदाहरण गिनाने से क्या होगा. बस पात्र बदल जाएंगे...सब जगहों की कहानी तो यही है. सोच रहा हूं...लोग पत्रकार क्यों बनते हैं...अगर मक़सद रसूख़ हासिल करना होता है तो तलवार की जगह कलम को क्यों चुनते हैं...अगर चुनते हैं तो फिर लड़ते क्यों नहीं..हथियार क्यों डाल देते हैं.

स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि अगर सच कहने पर पूरी दुनिया भी ख़िलाफ हो जाय तो मत झुको. तन कर खड़े रहो. सामना करो. पहले उपेक्षा,..फिर अनुसरण,..आगे प्रशंसा..अंत में तुम्हें स्वीकृति मिलेगी. हमारे अग्रज ये राह अपनाने की शुरूआत करें तो स्थितियां बदलते देर नहीं लगेगी. कलयुग है...द्वापर की तरह कोई कृष्ण तो आने से रहे....इसलिए दांव पर लगाने के बाद भी द्रौपदी की इज़्ज़त हमें ही बचानी होगी. बाद में कुरूक्षेत्र की लड़ाई जीतने के लिए झूठ तो बोलना ही पड़ेगा...इसलिए धर्मराज के आदेश का इंतज़ार नहीं करिए...अर्जुन!,भीम!,नकुल!,सहदेव!...सुन रहे हैं ना..उठिए! अब बहुत देर हो गई है.

सोमवार, 1 दिसंबर 2008

ये ख़बर थी कुछ अलग...


ये ख़बर थी कुछ अलग,.. हर नज़र ठहर गई
रात से सुबह हुई,....शाम यूं ही ढल गई
फिर अल्लसुबह से रात तक ..
कुछ नहीं बदल सका
धुएं की धुंध बीच का
मंज़र रहा दबा-दबा..
इस शहर की बानगी...अबके गांव तक पहुंच गई
ये ख़बर थी कुछ अलग,.. हर नज़र ठहर गई

यूं जो छोड़ के चले,
हाथ जोड़ के चले
होठ बंद थे मगर,
बिन कहे भी कह चले
जी सको तो इस तरह,..मर सको तो इस तरह
मेरी तो आज ज़िंदगी,..मौत से संवर गई
ये ख़बर थी कुछ अलग,.. हर नज़र ठहर गई

शनिवार, 29 नवंबर 2008

बिना ब्रेक के ख़बर.....


बहुत दिनों के बाद ये ख़बर बिना ब्रेक के थी. मुंबई पर हुआ आतंकी हमला ख़बरिया चैनलों को उनके सरोकारों की याद दिला गया....बहुत दिनों के बाद पत्रकारों को कुछ करने का संतोष मिला होगा. ये केवल एक आतंकी घटना को कवर करने की बात नहीं थी...ये एक मिशन था. मिशन एकजुटता का...मिशन मुश्किल वक़्त में देश को एक साथ खड़ा करने का. अपनों को खोने वालों को ये भरोसा दिलाने का...कि उनका दर्द सौ करोड़ लोगों का दर्द है. बुधवार,..26 नवंबर की रात से लेकर 28 की शाम तक और उसके बाद अगली सुबह शहीदों के अंतिम संस्कार तक....ख़बरें टूटी नहीं...और देश को एकजुट करती गईं...कुछ दिनों पहले सियासत ने मुंबई के बहाने देश को बांटने की कोशिश की थी....लेकिन मुंबई पर जब ख़तरा आया तो पूरा देश उठ खड़ा हुआ...

कोई काम कहीं भी कर रहा हो...इस ख़बर पर सबकी नज़र थी....सबने ख़ुद को ख़बरिया चैनलों के क़रीब बनाए रखने की कोशिश की. पूरा देश टकटकी लगाए देख रहा था. अब आगे क्या होगा....कोई नहीं जानता था..लेकिन जानना हर कोई चाहता था. भूत और भविष्य बताने वाले लोगों को लेकर जो आकर्षण होता है कुछ उसी तरह का भाव मीडिया के प्रति भी रहा है. ये मीडिया की ताक़त है...इसलिए क्योंकि वह वर्तमान की तस्वीर पेश करता है. इसलिए लाइव न्यूज़ के अलावा कुछ नहीं चला. एलेवंथ आवर शब्द का मिथक भी टूटा हुआ था.

ऐसा नहीं है कि ख़बरों की होड़ में टीआरपी कहीं पीछे छूटी हुई थी. हिंदी के सबसे बड़े टीआरपी मास्टर ने बुधवार की रात अपने ऑफिस में ही ग़ुज़ारी. उनके सामने मुश्किल विजुअल की थी. सो दूसरे चैनलों से काम चलाया गया. कीचड़ के खेल में दामन को सफेद बनाए रखने के लिए ऐसे हेडर लगाए गए कि दर्शकों की नज़र विजुअल्स पर अटके ही नहीं. और ये आइडिया काम भी कर गया...रात भर की मेहनत सुबह रंग लाई...जब एक कथित आतंकी का फोन दफ्तर में आया. और इसके बाद तो फिर पूछिए मत. चैनल के पास टीआरपी की होड़ में बने रहकर होटल ताज के सामने अपने संवाददाता को पहुंचाने का पूरा वक्त मिल गया. बाद में वहां उसकी ओबी वैन भी तैनात नज़र आई.

बाक़ी चैनलों में भी कहानी कुछ ऐसी ही थी. ताज होटल के सामने से कई चैनलों ने अपने कार्यक्रमों का लाइव प्रसारण किया. हिंदी के सबसे बुद्धिजीवी चैनल ने इस मौक़े पर साबित करने की कोशिश की कि उसे भी 'झनाक-झन' जैसे साउंड एफेक्ट के साथ पैकेजिंग करवानी आती है. शायद पहली बार उसने इस तरह के प्रयोग जमकर किए. ये पहली बार था कि इस चैनल ने ब्रेकिंग न्यूज़ फुल स्क्रीन टेक्स्ट के साथ दी.

अंग्रेज़ी चैनलों ने न केवल विजुअल्स ब्रेक किए..बल्कि ख़बरों को पेश करने के लिहाज से भी उन्हें दाद देनी होगी. नरीमन हाउस में एनएसजी की अंतिम कार्रवाई के दृश्य सबसे पहले एक अंग्रेज़ी चैनल पर ही दिखाए पड़े. उसके एंकर की भाषा एक आम भारतीय के जज़्बे को बयां कर रहे थे....आम लोगों के प्रति वही सरोकार...वही भाव-भंगिमा....अंग्रेज़ी चैनलों को जड़ से कटा हुआ बताने वालों को अब नए सिरे से सोचना होगा....

मीडिया ने इस बार अपनी बड़ी भूमिका अदा की है. नरीमन हाउस फतह कर लौट रहे जवानों को सलाम करते लोगों में पत्रकारों की बड़ी फौज थी. एक हाथ में चैनल का बूम लिए दूसरे से हाथ हिलाते ख़बरनवीस...आम लोग सांसे थामे ख़बरिया चैनलों को देख रहे थे. जहां ये चैनल आ रहे थे....बीच की दो रात किसी को भी नींद नहीं आई.

कई बार सुना....लोग कहा करते थे...इतने चैनलों को देखेगा कौन...होटल ताज से लेकर नरीमन हाउस में चली आतंक-विरोधी कार्रवाई की कवरेज ने इसका जवाब दे दिया है. जवाब ये...कि सौ करोड़ का देश सौ ख़बरिया चैनलों को आसानी से पचा सकता है. बशर्ते उसे पूरी ख़बर अलग नज़रिए से मिले. इस बार ख़बरिया चैनलों ने देश को जोड़ने की भी कोशिश की. दो दिन बाद सभी पुराने एजेंडे पर वापस लौट जाएंगे...लेकिन इससे इन दो दिनों की अहमियत कम नहीं होगी.

सोमवार, 27 अक्टूबर 2008

ये देश का दर्द है....


राहुल के मुर्दा शरीर को पुलिस के जवान उठाकर लिए जा रहे थे...चुपचाप देख रहा था मैं. मन में उलझन बड़ी थी....लग रहा था नैतिकता के व्यामोह में फंसकर तटस्थ रहने का अपराध कर रहा हूं...अगले ही पल देशहित और एकता की बात याद आई. महाराष्ट्र को देश की गौरवभूमि के रूप में देखता आया हूं....ये दृष्टि किसी व्यक्ति विशेष से कभी प्रभावित नहीं हो सकती. लेकिन दिल आज बेहद आहत है. एक बिहारी के रूप में राहुल की मौत का शोक मनाने का कोई मतलब नहीं है....ये देश भर का दर्द है.

राहुल!....हमें पता है कि घोर निराशा में तुझे कोई राह नज़र नहीं आई होगी...और तुम इस रास्ते पर चल पड़े....हमें पता है कि राज ठाकरे तुम्हारे आत्मसम्मान को धिक्कार रहा था...और तुमसे रहा नहीं गया...
हाथों में थामे पिस्तौल को भूल जाइए...उसके चेहरे को याद रखिए....एक स्वतंत्र देश के नागरिक के रूप में जीने की इच्छा उसकी भी रही होगी...और इसी वजह से उसकी जान गई.

बचपन से उसने आज़ादी का जश्न मनाया होगा....हर बार एक भारतीय के रूप में गर्व महसूस किया होगा....सीना तान के चलने वाले इस नौजवान ने जब बिहारियों को बिना दोष बार-बार लतियाते जाते देखा होगा...तो उसका ख़ून खौलना लाजिमी था. फर्क बस इतना था कि उसे ये भरोसा नहीं था कि राज ठाकरे के अत्याचार के खिलाफ आवाज़ उठाने वाला देश में कोई बचा है...इसलिए उसने अपनी ताक़त पर ये लड़ाई लड़ने का फैसला किया...

प्रांतवाद के नाम पर राहुल को मारा गया....इसकी मुझे कोई वजह नज़र नहीं आती. राहुल की मौत हर किसी को हिलाने वाली है....ये एक बेरोज़गार की व्यथा है...ये चारों तरफ से गालियों की बौछार सुनने वाले प्रदेश का विद्रोह है....ये देश के दुश्मनों को अपनी बदौलत मिटा डालने के हौसले की कहानी है...राहुल की राह गलत थी....उसका साहस नहीं....उसका संदेश नहीं....

राज की जान लेने की कोई ज़रूरत नहीं...विरोध के रास्ते और भी हैं...लेकिन राष्ट्रहित को दांव पर लगाकर मराठा छत्रप बनने की दुराकांक्षा पालने वाले इस नेता के विरोध का इतना बड़ा साहस किसी ने पहली बार दिखाया है...राहुल की ग़लती बस इतनी थी कि वो देश के क़ानून को भूल गया था.

पुलिस के बारे में कुछ नहीं कहना...ये उसका चरित्र है....पुलिस को ऐसी स्थितियों से निबटने की न तो समझ है और न ही उसे कोई तरीक़ा ही नज़र आता है...चाहे वो महाराष्ट्र की हो या बिहार की.

नेता इसे राजनीतिक रंग न दें....कुछ करना है तो बिहार से महाराष्ट्र पहुंचकर वहां की जनता का साथ लें...राज ठाकरे को उसकी मांद में घुसकर बता दें कि देशहित की बात करने वाला असली शेर कौन है...देखें कि ये राज ठाकरे उनका क्या बिगाड़ता है...सब कुछ शांति से हो...विरोध पूरी तरह अहिंसक हो...तो महाराष्ट्र से खदेड़ दिए जाएंगे राज ठाकरे और उन्हें बचने की जगह बिहार में मिलेगी.

गुरुवार, 9 अक्टूबर 2008

ये वानर कौन है?


लोग कह रहे हैं आज विजय दशमी है....तिथियों की गणना इस बात की तस्दीक कर रही है....रावण-दहन की औपचारिकता भी हर साल की तरह है...पर इस बार पता नहीं क्यों....मन से उल्लास नदारद है. मैं बीते रात देखे गए सपने को अब तक नहीं भूल पाया हूं....इसलिए मुझे तो जलने के बाद भी रावण अट्टहास करता नज़र आ रहा है....भय से सहमे लोगों के चेहरों पर उसकी छाया देख रहा हूं मैं...मेरी आंखें सुबह से ही खुली हैं...पर जो हक़ीक़त देख रहा हूं वो सपना लग रहा है....और सपना हक़ीक़त जान पड़ रहा है.. ....कल रात मैंने रावण से पूछा था कि वो इतना ख़ुश क्यों है.....उसने मुझे घूर कर देखा और हंस पड़ा.....मैंने अपना सवाल दुहराया...रावण ने कहा-धरती पर उसे कोई नहीं मार सकता....इसलिए क्योंकि ये सिर्फ राम के वश की बात है....अकेले वानरों के वश की बात नहीं. मैं सोच रहा था...ये वानर कौन है?

शनिवार, 27 सितंबर 2008

अब तो जागो देश मेरे...

दिल्ली में आतंकियों ने इस बार फूल बाज़ार में बम रखे...फिर हुआ धमाका...आगे की कहानी वही....जो हर बार की है. यही हालत है अपने देश की. आतंकियों के आगे बेबस सी दिखती है सरकार....सलीके से जीने को लेकर गृहमंत्री पर मज़े लेती मीडिया...खुफिया एजेंसियों की बाल की खाल निकालते कलमकार ...ऐसे ही चल रहा है अपना देश...

रोजी रोटी से अलग सोचने की महानगरों में किसे फुर्सत है. मुसीबत में एक होने का जज्बा न्यूज़ स्टोरी के पैकेज में ही अच्छा लगता है....पर हकीकत इससे बहुत अलग है. टुकड़ों में बंटी हमारी ज़िंदगी एक-दूसरे से इतना दूर कर जाती है,..कि देश के लिए सोचने की तरफ तो ध्यान भी नहीं जाता.

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ऐसे में बड़ी ताक़त बनकर उभरता है. पर कुछ समय के लिए...उसके तेवर मौसमी हैं,...पलटबाज़ी करने में ,..रंग बदलने में उसका सानी नहीं...कब क्या कह जाय,...कब क्या कर जाय कुछ ठिकाना नहीं. हिंदी में शब्द है,...अन्मयस्क...इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर बिल्कुल सटीक बैठता है. रोज-रोज का बंदर नाच उसके अंदर की कहानी ख़ुद ब ख़ुद बता रहा है.

पैसों ने पत्रकारों के दिमाग को कुंद कर दिया है...बस पैकेज नज़र आ रहा है...इसलिए दुधारी गाय की दुलत्ती भी सही जा रही है. जो लिखा जा रहा है,..उसका मक़सद कुछ और है. जो दिखाया जा रहा है उसका मक़सद कुछ और है...तय है कि इसके केंद्र में देश नहीं.

उधर,..आतंकी..हैं...वे बेफिक्र हैं...वो धमाकों के बाद टीवी के सामने बैठकर लाशों की गिनती करते हैं...वे जानते हैं कि सौ करोड़ से ज्यादा की आबादी वाले देश में सबकी ख़ैर कौन कर सकता है. कितने आतिफ को गोलियों से भूनोगे,...कितने तौक़ीर की तलाश करोगे,...पहले जान तो लो इनकी तादाद कितनी है.

इंडिया गेट पर पुलिस लगाओगे,..तो कनाट प्लेस के कूड़ेदान में करेंगे धमाके,....वहां पुलिस लगाओगे तो फूल बाज़ार में करेंगे धमाके,...सड़क-चौक-चौराहे,...कूड़ेदान,..फूलदान..देश में हर जगह पहरा नहीं बिठाया जा सकता है...मेरे भाई.

देश का नासूर क्या है,....वो साफ है. पर कोई सच बोलने की हिम्मत नहीं करता है. इसी देश में एक तरफ महेश चंद शर्मा को शहीद बताया जाता है,..तो दूसरी तरफ उनके बदन में गोलियां उतारने वालों के समर्थन में हज़ारों लोग खड़े होते हैं.

इनके लिए क्या कहें...पर कुछ तो कहना होगा. सच बोलने की शुरूआत करनी होगी. गुनिए..चुनिए...फिर बोलिए...वक्त यही है.....अब तो जागो देश मेरे.

शनिवार, 6 सितंबर 2008

इस बर्बादी के किरदार ?

हंसने-मुस्कुराने पर वक्त पाबंदी नहीं लगाता,..इसके मौक़े हर जगह हैं. पर कहीं-कहीं चाह कर भी आप हंस नहीं सकते,..विश्वास नहीं होता....तो कोसी के प्रलय से पीड़ित लोगों के पास पहुंचिए...चारों तरफ दर्द ही दर्द. दर्द बहुत गहरा है इसलिए चीख भी ऊंची है.

पानी से भरे गांव में ऊंची जगह बनी एक घर की छत पर पचास लोग शरण लिए हुए हैं,...चौदह दिन बीत गए,...जो कुछ बचा था,...लोगों ने आपस में बांटकर जिंदा रहने की कोशिश की...पर बीमार पड़े एक युवक को बचाया नहीं जा सका. उसकी लाश को जलाने के इंतज़ाम नहीं हैं,...कोई नाव नहीं,...मोटर बोट झांकने तक नहीं आई...आकाश के रास्ते भी राहत की गड़गड़ागट सुनाई नहीं पड़ी...ऐसे में लाश वहीं रखी है,..तीन दिन हो गए. बदबू आ रही है...दो दिनों से हो रही बारिश के बाद कई बीमार हो गए हैं....वे भूखे हैं,..गंदा पानी पी-पीकर अब तक बचे हैं,..पर शरीर अब जवाब दे रहा है.,,..ये एक संदेश है,.. सहरसा में मदद की गुहार कर रहे एक पिता ने अपने बेटे का दो दिन पुराना ये संदेश जब पत्रकारों को सुनाया,...तो सबके रोंगटे खड़े हो गए.

कोसी की धारा ने कई किंवदंतियों को बदल दिया है,...किस कदर तकलीफ झेलकर मनुष्य ज़िंदगी की लड़ाई लड़ता है,...इससे जुड़ी कहानियां उत्तर-पूर्वी बिहार के प्रभावित इलाक़ों में सैकड़ों लोगों की ज़ुबान पर है....आप सुन नहीं पाएंगे,...दर्द को साझा करने वाली आपकी भावनाएं जवाब दे जाएंगी.

बहुत कुछ बदल दिया है कोसी ने,,...जो नहीं होना चाहिए था,..वो भी किया है कोसी ने,...कोसी उद्दंड हो गई है,...या उसने अपने ऊपर की जा रही ज्यादतियों का जवाब दिया है,...उसकी थाह लेने में अभी देर लगेगी...पर इतना तय है कि इस बार....उसकी धारा ने बिहार को समाजवाद का पाठ पढ़ा दिया है,...गरीब का कुछ कर नहीं सकती थी,....सो,..अमीरों को ग़रीब बना दिया है. पर क्या यही रास्ता था ?

ये सवाल इस नदी से मत पूछिए,...पूछिए इसे बांधने वालों से,...सवाल कोसी भी पूछ रही है,...कि उसका मान-मर्दन होता रहा,... पर नदी के तीर बसने वाले चुप क्यों रहे. जवाब सोचिए,..कहीं इस बर्बादी के किरदार आप और हम भी तो नहीं?

बुधवार, 3 सितंबर 2008

ना ही मोरा गइंठी में एको रूपैया.....

हे जगदम्बा,..तू ही अवलम्बा,..तू ही मोरी भक्ति की सुधि लेवैया,...न ही कोई हित,..न ही परतीत,..न ही मोरा गइंठी में एको रूपैया....ये एक गीत है. नदियों को देवी समझ पूजने वाली बिहार की महिलाएं बाढ़ की इस विपदा में इसे गा रही हैं. अपनों की जान सलामत रखने के लिए,..कर जोड़कर,..कर रही हैं विनती. माँ तेरा ही सहारा है,..कोई और सुध लेने वाला नहीं है,...न कोई अपना है,..न जान पड़ता है....गइंठी (साड़ी के पल्लू के छोर को बांधकर बनी झोली) में अब एक रूपया भी नहीं.

इस गीत में दर्द है..बेबसी है..अंतिम समर्पण है,..साथ तमाम आशंकाओं के बीच बची-खुची आशा भी है. पर सिर्फ भगवान से. बाढ़ पीड़ित समझ रहे हैं...कि क्या होने वाला है. तीस लाख से ज्यादा लोगों की उम्मीदें अब सिर्फ ऊपरवाले पर ही टिकी हैं.

लोग ज़िंदा इसलिए हैं क्योंकि वो मरना नहीं चाहते. चारों तरफ पानी. छत पर भूखे-प्यासे लोग पड़े हैं. बच्चों को चुप भी कराना है. ख़ुद को भी बचाकर रखना है.

हफ्ते भर बाद हेलीकॉप्टर की गड़गड़ाहट सुनकर लगता है,...जैसे जान में जान आई. पर हेलीकॉप्टर राहत का सामान गिराए भी तो कहां,...छोटी सी छत पर अनगिनत लोग जमा हैं. ऐसे में राहत सामग्री पहुंचाई नहीं जा सकती.

हेलीकॉप्टर वापस लौट जाता है. फिर सुबह-सुबह सुनाई देती है,...मोटर बोट की आवाज़. नीचे आए बोट को देखकर आपाधापी मच जाती है. बच्चों को कांधे पे उठाए महिलाएं,..तेज़ी से नीचे उतरती हैं. कमर भर पानी में भी सरपट भागती हैं. रोती-चिल्लाती....अंतिम हथियार,....ताकि बोट तक सबसे पहले पहुंच जांय.

इतने लोगों के लिए बोट नाकाफी है,..अब क्या किया जाय. फिर ढाढ़स मिलता है,..हम जल्द आ रहे हैं.....पर इतना धीरज किसे है. ..बाक़ी बचे लोग कलपने लगते हैं. पर कोई चारा नहीं. अब अगली बारी कब आएगी. कोई नहीं जानता. तब तक कैसे जिएं लोग.

शौच तक की दिक्कत है. सालों ज़िंदगी जिस समाज में जी,...अचानक लाज-शर्म को कैसे छोड़े कोई. नीचे पानी ही पानी है...और यहां...लोग ही लोग....

बार-बार लोग सोचते हैं,..ये मौत से भी बदतर ज़िंदगी है. पर मरने की कोई नहीं सोचता...बच्चों का मुंह देख कर जीने का दिल करता है. ख़ुद के लिए नहीं इनके लिए.

बुज़ुर्गों का कोई पूछनहार नहीं. रोते हुए बच्चों के आगे वे अपनी भूख,...अपनी कमज़ोरी का ज़िक्र करने तक की हिम्मत नहीं करते. चुप रहते हैं. लोगों को हौसला क्या दें. उनका कौन सा अनुभव इस मुश्किल से उबरने का दूसरों को रास्ता दिखाएगा. वो तो पीड़ितों की संख्या बढ़ाने वाले अवांछित तत्व हो गए हैं.

वे बस गीत गा सकते हैं,....हे जगदम्बा....तू ही अवलम्बा.....तू ही मोरी भक्ति की सुधि लेवैया,,....आस गए तेरी दासी हूं मैं प्रभु,..डूबल नाव तुम्ही हो खेवैया,...