शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2009

इसमें शर्म की क्या बात है?

स्लमडॉग मिलेनियर को लेकर कई बातें हो रही हैं. ज्यादातर लोग यही कह रहे हैं कि ये भारत की गरीबी को दिखाने वाली फिल्म है. उनके मुताबिक हिन्दुस्तान के अंधेरे कोने पर ही फिल्मकार का कैमरा केंद्रित रहा है. ये कहना कुछ अजीब सा लगता है कि स्लमडॉग मिलेनियर इस वजह से सफल हुई कि उसमें भारत की गरीबी दिखती है.

इस फिल्म की पटकथा बेहद कसी हुई थी,...एक के बाद एक संयोग का ख़ूबसूरत फिल्मांकन,...और इससे आगे आपस में उलझने की बजाय सुलझते जाते कथा-तंतु। स्लमडॉग के आगे बढ़ने की कहानी में भारत के सभी शेड हैं. मुश्किल बस इतनी है कि भारत को किसी विदेशी फिल्मकार ने बड़े ही क़रीब से समझने की कोशिश की है...ये प्रयास क़ामयाब रहा है. यही वो वजह है कि हमारे कई दोस्तों को ये बातें चुभ रही हैं. मुगालते में जीने की बात तो हम में है...वरना फिल्म में बुरा क्या है. कोई ये तो बताए कि डैनी बॉयल ने हक़ीक़त से उलट क्या बातें फिल्म में दिखलाई हैं. पूरी सच्चाई सैल्युलाइड पर नहीं उतर सकती. लेकिन जितनी उतर सकती है उनमें से कई स्लमडॉग में हू-ब-हू नज़र आई है. भुलावे और छलावे में वक्त गुज़ारने की आदत हमारी है.

बॉलीवुड में कितनी फ़िल्में बन रही हैं जिसमें ग्रामीण भारत,...झुग्गी झोपड़ियों में रहने वाला भारत,..अपने हाल पर जीने को मजबूर,...जीने के लिए हर समझौता करने को तैयार लाचार भारत की कहानी दिखती है....गिनती की फिल्मों को छोड़कर कहां देख पाए हैं हम..अपना देश...अपनी धरती....धरती-पुत्रों की कहानी...युवाओं का संघर्ष, बेरोज़गारी की व्यथा, भ्रूण हत्या...शेयर बाज़ार की लूट. सपना तो ये सब है,...हमें डर लगता है कि कहीं कोई हमारा चेहरा न देख ले...ये डर क्यों है?,…हम छुपाना चाहते हैं दुनिया से अपनी हक़ीक़त. नहीं जताना चाहते कि हम क्या हैं. दरअसल हम चमक रहे हैं इसलिए अपना देश भी हमें चमकता हुआ नज़र आता है.

हम झुग्गियों में रहने वाले लोगों को अपने देश का बाशिंदा नहीं मानते तभी तो इसे गरीबी दिखाने का कुत्सित प्रयास कह रहे हैं,...वरना क्या ग़लत है कि किसी ने बिना चकाचौंध का बड़ा सा सेट लगाए....एक सपनीली फिल्म,...मटमैली बस्ती में फिल्मा ली. इस फिल्म की सफलता में चुभने वाली बात क्या है. संगीत हमारा था,..विशुद्ध हमारा...पूरी दुनिया ने इसे पसंद किया...डिंग-डिंग-डिंगा पर हम ही नहीं झूमे,..सभी के पांव थिरके. जय हो...का मतलब भले कोई देर से समझे पर भाव समझने में किसी को दुविधा नहीं हुई.

बंधु...ये भारत का आकर्षण है,...भारत की जीवनीशक्ति को सलाम है...झेंपिए मत. भारत क्या है...कैसा है...अब इसे नए सिरे से समझाने की ज़रूरत नहीं है...ज़रूरत है तो हमें ख़ुद को जानने की,...जिसके लिए आज भी हमें विदेशी चश्मा लगाना पड़ता है...ये क्या बात हुई...कि जिस बात को लेकर दुनिया ताली बजा रही है...उसी पर हमें शर्म आ रही है.

शनिवार, 17 जनवरी 2009

मैं तो टल्ली हो गया!

34वें राष्ट्रीय खेलों के आयोजन को चौथी बार टाल दिया गया है. झारखंड को जब राष्ट्रीय खेलों की मेज़बानी मिली थी तो राज्य सरकार ने इसे अपनी उपलब्धि बताया था...लेकिन इस उपलब्धि का ‘बोझ‘ ढोने में वो नाकाम रही. राज्य में राष्ट्रीय खेलों के आयोजन के लिहाज से आधारभूत संरचना का अभाव था. इसको लेकर लंबी-चौड़ी योजनाएं बनीं. स्टेडियम से लेकर खेलगांव के निर्माण के लिए देश भर से टेंडर मंगवाए गए. लेकिन कागज़ की बजाय ज़मीन पर काम तेज़ी से नहीं हुआ. राज्य की राजनीतिक अस्थिरता भी इसके पीछे एक प्रमुख वजह रही.



इन खेलों का आयोजन सबसे पहले नवंबर 2007 में टला,...दूसरी बार पर्याप्त तैयारी नहीं होने की वजह से इसे मार्च 2008में टाला गया...लेकिन इस बार भी तैयारियों के लिहाज से तय तारीख़ पर आयोजन संभव नहीं हुआ.तीसरी बार आयोजन की दिसंबर में तय तारीख़ भी टालनी पड़ी. भारतीय ओलंपिक एसोसिएशन के अधिकारियों ने तय वक़्त पर खेलों का आयोजन नहीं होने पर जुर्माने की चेतावनी दी थी. लेकिन इसका कुछ असर नहीं हुआ. यही वजह है कि 15 से 26 फरवरी के बीच खेलों के आयोजन की तय तारीख़ को एक बार फिर टाल दिया गया है...अब इस बात की संभावना है कि खेल जून में होंगे...लेकिन पक्के तौर पर कुछ भी कहना मुश्किल है.

इस बीच ज़रा उन खिलाड़ियों के बारे में सोचिए जिन्होंने एक-एक दिन के हिसाब से अपनी तैयारियों में लगे हैं. उनके उत्साह पर कितना असर हो रहा होगा...या..यूं कहें इन खेलों में भागीदारी को लेकर उनमें उत्साह बाक़ी ही नहीं होगा. 33वें राष्ट्रीय खेल आतंकवाद के साए में हुए थे...इसकी तारीख़ भी टालनी पड़ी थी...आख़िरकार गुवाहाटी में ये सम्पन्न हो गए. लेकिन गुवाहाटी और रांची के बीच बड़ा फर्क है. उल्फा की धमकियों के बीच गुवाहाटी में राष्ट्रीय खेलों का सफल आयोजन हुआ था...इसे सरकार की मज़बूत इच्छाशक्ति का परिचायक माना गया...लेकिन रांची में बात ठीक उलट है.

इसे सिवाय लापरवाही के कुछ और नहीं माना जा सकता. रही बात ज़िम्मेदारी की तो वो सब के कंधे जाती है. भारतीय ओलंपिक एसोसिएशन जिस तरह ग़लती पर ग़लती किए जाने के बाद भी झारखंड को माफ करता रहा...उसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता. इस वजह से देश की प्रतिष्ठा को भी कम ठेस नहीं पहुंची है. अगर राष्ट्रीय खेलों का आयोजन कुछ लापरवाह नेताओं और अधिकारियों के भरोसे छोड़ दी जाए...तो इससे बुरी बात और क्या होगी?. दुर्भाग्य से यही हो रहा है.

शुक्रवार, 16 जनवरी 2009

द्रोणाचार्य का ये हाल!



ओलंपिक के दौरान हर सुबह अख़बारों में छपी पदक-तालिका को लोग बड़ी उत्सुकता से देखते हैं. लेकिन हर बार निराशा ही हाथ लगती है. तब और भी कोफ्त होती है जब युगांडा और इथोपिया जैसे देश हमसे काफी आगे नज़र आते हैं. इसके पीछे की वजह को दुहराने की ज़रूरत नहीं. लेकिन ताज़ा कहानी सुनकर आप चौंक जाएंगे....अख़बारों में ये पढ़कर हैरत हुई कि तीरंदाज़ी के राष्ट्रीय कोच लिम्बा राम के पास सर ढंकने तक की जगह नहीं है. जयपुर में रहने वाले लिम्बा का ठिकाना फिलहाल एक विधायक के सरकारी निवास का गैरेज है.

उदयपुर ज़िले के एक गांव में जन्मे लिंबा अहरी जनजाति से ताल्लुक रखते हैं...जंगली इलाक़ों से शुरूआत कर तीरंदाज़ी के ज़रिए उन्होंने ओलंपिक का सफर तय किया. तीरंदाज़ी में देश का नाम रोशन करने पर उन्हें १९९१ में अर्जुन पुरस्कार से नवाजा गया. लेकिन कहानी ये नहीं है,...दरअसल लिम्बा राम ने अब तक शादी नहीं की है,....इसके पीछे की वजह बिल्कुल अलग है. उन्हें नहीं लगता था कि आर्थिक रूप से वे परिवार का बोझ उठाने में सक्षम हैं. आज भी उन्हें यही लगता है...

तब जबकि वे तीरंदाज़ी के राष्ट्रीय कोच हैं. उनकी तनख्वाह बस इतनी है कि किसी तरह अपना ग़ुज़ारा हो जाय. १९९२ के बार्सिलोना ओलंपिक में वे कांस्य पदक से मामूली अंतर से चूक गए थे. उनके नाम विश्व रिकॉर्ड भी रहा है. ओलंपिक में तीन बार देश का प्रतिनिधित्व करने वाले इस द्रोणाचार्य का हाल सुनकर आपकी आंखें गीली हुए बिना नहीं रहेंगी. खेल के मैदान में हासिल उनकी उपलब्धियों से देश का सम्मान तो बढ़ा लेकिन लिम्बा राम की हैसियत नहीं बदली...उन्हें कभी घास काटने की नौकरी दी गई तो कभी चपरासी का काम करने को कहा गया.

बावजूद इसके उन्हें किसी से कोई शिकायत नहीं है. लिम्बा राम कहते हैं कि भारतीय होने को लेकर वे गर्व महसूस करते हैं और एक आम नागरिक के रूप में ज़िंदगी ग़ुज़ारने में उन्हें कोई तकलीफ नहीं. लेकिन बड़ा सवाल ये है कि क्या क्रिकेट के बारे में भी ऐसी कल्पना की जा सकती है,...

क्या आप सोच भी सकते हैं कि राष्ट्रीय टीम के कोच की ये हालत होगी....अगर होगी..तो क्या होगा? क्या बस इतने भर से इस ख़बर को भूल जाना चाहिए कि लिम्बा अपनी हालत से संतुष्ट हैं....उन्हें किसी से गिला-शिकवा नहीं.

एक रोचक तथ्य ये है कि राष्ट्रीय तीरंदाज़ी संगठन के अध्यक्ष लोकसभा में विपक्ष के धाकड़ नेता विजय कुमार मल्होत्रा हैं....उनका कहना है कि लिम्बा ने कभी इस बारे में शिकायत नहीं की. यानी नेताओं के लिए खेल,....बस राजनीति चमकाने का एक ज़रिया भर हैं....अगर ये बात सच नहीं होती तो क्या लिम्बा के मुंह खोलने का इंतज़ार किया जाता? लिम्बा ने अब भी मुंह नहीं खोला है,...उन्होंने बस पत्रकारों के सवालों का जवाब दिया है.

९ जनवरी को उन्हें राष्ट्रीय कोच नियुक्त किया गया है...उनसे पहले ये ज़िम्मेदारी दक्षिण कोरिया से आयातित कोच के कंधों पर थी...लेकिन सरकार को उम्मीद है कि अगले साल दिल्ली में होनेवाले राष्ट्रमंडल खेलों के लिए वो खिलाड़ियों को इस तरह प्रशिक्षित करेंगे कि पदकों की झड़ी लग जाए.

लिम्बा कुछ नहीं बोल रहे...उनसे जो कुछ हो सकता है वो करने में लगे हैं. जैसा कि अब तक वे करते आए हैं...लेकि क्या आप और हम हक़ीक़त को जानने के बाद अगले साल पदक-तालिका में भारत का नाम ढूंढ़ने को इतने उत्सुक होंगे?

शनिवार, 27 दिसंबर 2008

देशभक्ति का ज्वार-भाटा...


युद्ध का उन्माद आजकल हरतरफ नज़र आ रहा है. पाकिस्तान ने अपनी पलटन सीमाओं की तरफ भेजनी शुरू की..तो भारत में हलचल मच गई. मीडिया ने इस ख़बर को सर आंखों पर उठा लिया. कहीं दोनों देशों की सैनिक ताक़त की तुलना की जाने लगी...तो कहीं ये बताया जाने लगा कि युद्ध होने पर पाकिस्तान कितने दिन में मिट जाएगा? लोगों को ऐसी ख़बरें भाती हैं...लेकिन बस इतनी सी नहीं...उन्हें सतही जानकारियों के अलावा कुछ और देखने और सुनने को चाहिए..जो फिलहाल नहीं मिल रहा. ख़बरों से गहराई नदारद है. ऐसी पत्र-पत्रिकाओं की भी कमी पड़ गई है जिसमें तथ्यात्मक विवरण प्रकाशित होते हों.

ऐसे में युद्ध की आशंकाओँ की मार्केटिंग हो रही है. एक देश के रूप में हम अपना गौरव-गान चाहे जितना करते हों...बहुत हद तक तल्ख सच्चाई ये है कि आम नागरिकों के ख़ून में देशभक्ति एक मौसमी ज्वार की तरह आता है और भाटे की तरह चला जाता है. इसकी भी कोई तयशुदा मियाद भी नहीं है. ये ज्वार दरअसल आता नहीं है बल्कि लाया जाता है...और ये काम करता है मीडिया. इन दिनों यही हो रहा है.

सेना में हर पद पर लोगों की भारी कमी है. जवान से लेकर अधिकारी तक की किल्लत है. लेकिन इसकी याद तब आएगी जब युद्ध के दौरान हमें खामियाजा भुगतना पड़ेगा. तब लोग ख़ूब चिल्लाएंगे...ऊंची आवाज़ में ये बताने की प्रतिस्पर्द्धा होगी कि हमारे अंदर कहां कमी थी.

आप सभी को याद होगा कि कारगिल युद्ध के दौरान हमारे पास शहीद जवानों के शवों को उनके घर पहुंचाने के लिए बक्से ही नहीं थे. तब आनन-फानन में मुंहमांगी क़ीमत पर रातों-रात इसे इज़रायल से मंगवाया गया. इसको लेकर भी तत्कालीन रक्षामंत्री पर घोटाले के आरोप लगे. सच क्या था भगवान जाने...पर चूक तो साफ नज़र आ गई कि हम आपात स्थितियों के लिए कितना सावधान रहते हैं.

अभी वक़्त है कि हम अपनी कमियों को दुरुस्त कर लें...ये ज़िम्मेदारी अकेले रक्षा मंत्रालय, अधिकारी और नेताओं की नहीं है बल्कि मीडिया की भी उतनी ही है.

गुरुवार, 11 दिसंबर 2008

नासमझ कौन है?


लगातार पांचवें हफ्ते महंगाई की दर गिरावट पर है. इस ख़बर ने मनमोहन सिंह को बड़ी राहत दी होगी. विधानसभा चुनाव के नतीजों की वजह से नींद ऐसे भी अच्छी आ रही थी,...अब और सुकून मिला होगा. .पीएम को पहले डर रहा होगा कि कहीं आम लोग बेलगाम क़ीमतों से प्रभावित होकर कांग्रेस नीत सरकार के ख़िलाफ वोट न डाल दें....लेकिन ये आशंका अब ख़त्म हो गई होगी. अब पीएम मान के चल रहे होंगे कि आम लोगों को उनकी गंभीर कोशिशें भा गईं. लोगों ने ये समझ लिया कि सरकार को जो करना था वो कर रही है...और बहुत कर रही है. उन्हें तो यही लग रहा होगा कि जनता के सोचने का स्तर ऊंचा उठ गया है...वो उनकी बेबसी समझ रही होगी...उसे भी पता है कि ओपेक देश तेल की क़ीमतों को कम करने की गुहार नहीं सुनते...वो अपने लिहाज से काम करते हैं.

हम कोई हवाई क़िले बांधने की कोशिश नहीं कर रहे. बल्कि पीएम और उनके सहयोगियों की कार्यशैली के आधार पर उनकी वर्तमान मन:स्थिति का अंदाज़ा लगा रहे हैं. आप पूछेंगे कि एक व्यक्ति विशेष के मन के बारे में सपाट ढंग से ऐसा कैसे कहा जा सकता है. आपका कहना बिल्कुल ठीक है...इसलिए हमने कहा...ऐसी कोशिश कर रहे हैं.

चलिए मुद्दे पर आते हैं. भारत में शहर हों या गांव,...अगर एक औसत मतदाता की बात करें तो ज़्यादातर को ये पता भी नहीं होगा कि ये महंगाई दर कम कैसे हो रही है. कोई जानने की कोशिश भी नहीं करता...करता है तो भी समझ नहीं पता. अरे भई! जब सारी चीज़ें महंगी हैं तो फिर ये महंगाई की दर नीचे कैसे जा रही है... और अगर दुनिया भर के उतार-चढ़ाव के कारण ऐसा हो रहा है तो हम इसे महंगाई का अपना मीटर क्यों मानें. और ये जो मीटर है...वो भी हफ्ते दो हफ्ते पीछे का होता है....ठीक-ठीक याद रखना भी मुश्किल. मान लीजिए हफ्ते-पखवाड़े भर पहले महंगाई जितनी थी...उसका परिणाम ये महंगाई का मीटर मौजूदा वक़्त में बताता है...तो फिर इसका हिसाब रखने का मतलब क्या है.

अब अगर क्रूड ऑयल के सस्ता होने से भारत में महंगाई की दर गिर गई...तो इसमें सरकार काहे का ढोल पीट रही है. पहले तो सब कह रहे थे...हमारा दोष नहीं है...हम क्या कर सकते हैं....हमारे वश की बात नहीं है...तो फिर अब इसके पीछे सरकार की गंभीर कोशिशों को श्रेय देने की बात कहां से आ गई. ख़तरा ये भी बरक़रार है कि जुलाई के बाद चार महीनों में तिहाई क़ीमत पर आया कच्चे तेल का दाम अगर अगले चार महीनों में फिर ऊपर चढ़ गया तो क्या होगा ?

अब..जनता परिपक्व हो रही है या देश के कर्ता-धर्ता और भी नासमझ....ये बात समझना मुश्किल नहीं.

सोमवार, 8 दिसंबर 2008

पत्रकारिता के दरबार में सिद्धांतों का चीर-हरण


महाभारत की कहानी सबको याद होगी. युद्धिष्ठिर को धर्मराज कहा जाता था. इसलिए क्योंकि वो सत्यवादी थे, न्यायप्रिय थे,...उनके चारों अनुज एक से बढ़कर एक थे. कोई महाबलशाली तो कोई धनुर्धर. बावजूद इसके इन पांचों की पत्नियां भरे दरबार में नंगी की जाती रही और वे कुछ नहीं कर सके. इसलिए नहीं कि इन पांडु पुत्रों में क्षमता नहीं थी. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि 'धर्मराज' युद्धिष्ठिर ने द्रौपदी को दांव पर लगाने का फ़ैसला ख़ुद किया था....और वो ठहरे नीतिवान..इसलिए बाज़ी हारने के बाद दु:शासन का विरोध न करने को वो ज़्यादा नीतिसंगत मानते थे. बाक़ी के चारों अनुजों का ख़ून खौल रहा था...लेकिन उन्हें बड़े भाई के हर आदेश का पालन करना द्रौपदी की इज़्ज़त बचाने से ज़्यादा सही लगा. आगे क्या हुआ...सभी जानते हैं...अवतारी कृष्ण न होते तो हस्तिनापुर के दरबार के उस हाल-ए-बयां को लिखने में महर्षि वेदब्यास की उंगलियां भी कांप जातीं...और ये भारत के सभी महाकाव्यों का सबसे शर्मनाक अध्याय होता. धर्म की दृष्टि से...पौरुष की दृष्टि से और न्याय की दृष्टि से भी.

बाद में महाभारत की लड़ाई हुई..और..इसमें जीत हासिल करने के लिए 'धर्मराज' ने झूठ का भी सहारा लिया...तो क्या धर्मराज के विचार परिवर्तित हो गए थे...या उनके 'नीतिसंगत' दृष्टिकोण के मुताबिक़ विशेष अवसरों पर झूठ बोलना सही था. मुझे आज भी ये बात मथती है कि युद्धिष्ठिर ने अपमान की पराकाष्ठा के वक़्त नीति-अनीति पर किस तरह से विचार किया...और किया तो उन्हें धृतराष्ट्र पुत्रों का विरोध सही क्यों नहीं लगा.

महाभारत धारावाहिक में मैंने ये सब देखा था...तब स्कूल में पढ़ता था...चौथी या पांचवीं में था. आज लगभग सत्रह-अठारह साल बाद ये बातें याद आ रही हैं...ये मन को बुरी तरह मथ रही हैं. पत्रकारिता में चार साल से हूं पर पिछले कुछ महीनों के अनुभव जीवन भर याद रहने वाले हैं. सोचने को ये विवश करेंगे.

दिनकर की कविताओं में कहीं पढ़ा था...'हो चाहे जहां अनय..उसको रोको रे...यदि ग़लती करें..शशि-सूर्य उन्हें टोको रे'. इन शब्द-युग्मों का मतलब मुझे पत्रकारिता समझ में आया था. पत्रकारिता से रोटी कमाने का फ़ैसला मेरा अपना था. मुझे लगता था अपने स्वाभाविक गुणों का इस्तेमाल मैं इसके सिवाय कहीं और नहीं कर सकता. लेकिन काम के दौरान हासिल हो रहे अनुभवों से महसूस कर रहा हूं कि पत्रकारिता के लिए जो गुण मुझे स्वाभाविक और बेहद ज़रूरी लगते थे....दरअसल वो इस पेशे में अब अवांछित माने जाने लगे हैं. जैसे हर ग़लत बात का विरोध करना.

महाभारत की पृष्ठभूमि में कहूं तो पत्रकारिता के दरबार में सिद्धांतों का चीर-हरण हो रहा है...और धर्मराज (वरिष्ठ पत्रकार) उसी तरह सर झुकाए बैठे हैं...उनके अनुजों की राह भी पुरानी है. महाबलशाली,...धनुर्धर..कुरूपुत्रों को सबक़ सिखाने की क्षमता रखने वाले अनुजों के कथानक बदले नहीं हैं. वे हर आदेश बजाने को तैयार हैं..सब कुछ सहने को तैयार हैं. धर्मराज युद्धिष्ठिर ने ये सब नीति के पालन के नाम पर किया था और करवाया था...वर्तमान में ये प्रोफेशनलिज़्म के नाम पर किया जा रहा है. उदाहरण गिनाने से क्या होगा. बस पात्र बदल जाएंगे...सब जगहों की कहानी तो यही है. सोच रहा हूं...लोग पत्रकार क्यों बनते हैं...अगर मक़सद रसूख़ हासिल करना होता है तो तलवार की जगह कलम को क्यों चुनते हैं...अगर चुनते हैं तो फिर लड़ते क्यों नहीं..हथियार क्यों डाल देते हैं.

स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि अगर सच कहने पर पूरी दुनिया भी ख़िलाफ हो जाय तो मत झुको. तन कर खड़े रहो. सामना करो. पहले उपेक्षा,..फिर अनुसरण,..आगे प्रशंसा..अंत में तुम्हें स्वीकृति मिलेगी. हमारे अग्रज ये राह अपनाने की शुरूआत करें तो स्थितियां बदलते देर नहीं लगेगी. कलयुग है...द्वापर की तरह कोई कृष्ण तो आने से रहे....इसलिए दांव पर लगाने के बाद भी द्रौपदी की इज़्ज़त हमें ही बचानी होगी. बाद में कुरूक्षेत्र की लड़ाई जीतने के लिए झूठ तो बोलना ही पड़ेगा...इसलिए धर्मराज के आदेश का इंतज़ार नहीं करिए...अर्जुन!,भीम!,नकुल!,सहदेव!...सुन रहे हैं ना..उठिए! अब बहुत देर हो गई है.

सोमवार, 1 दिसंबर 2008

ये ख़बर थी कुछ अलग...


ये ख़बर थी कुछ अलग,.. हर नज़र ठहर गई
रात से सुबह हुई,....शाम यूं ही ढल गई
फिर अल्लसुबह से रात तक ..
कुछ नहीं बदल सका
धुएं की धुंध बीच का
मंज़र रहा दबा-दबा..
इस शहर की बानगी...अबके गांव तक पहुंच गई
ये ख़बर थी कुछ अलग,.. हर नज़र ठहर गई

यूं जो छोड़ के चले,
हाथ जोड़ के चले
होठ बंद थे मगर,
बिन कहे भी कह चले
जी सको तो इस तरह,..मर सको तो इस तरह
मेरी तो आज ज़िंदगी,..मौत से संवर गई
ये ख़बर थी कुछ अलग,.. हर नज़र ठहर गई